बुधवार, 26 जनवरी 2011

गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई...


ये रोज कोई पूछता है मेरे कान में,
हिंदोस्ताँ कहाँ है अब हिंदोस्तान में !!!
इन बादलों की आँख में पानी नहीं रहा,
तन बेचती है भूख एक मुट्ठी धान में !!!
तस्वीर के लिये भी कोई रूप चाहिये,
ये आईना अभिशाप है सूने मकान में !!!
जनतंत्र में जोंकों की कोई आस्था नहीं,
क्या फ़ायदा संशोधनों से संविधान में......!!!
धन्यवाद...
समीर सृजन
फैकल्टी,
डिपार्टमेंट ऑफ़ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन,
रांची यूनिवर्सिटीरांची 

बुधवार, 19 जनवरी 2011

Appreciation Award

This letter of appreciation award goes to those emerging journalist of Master of Arts in Mass Communication, 1st Semester, who has participated in the presentation held on 13 January, 2011. The topic was “Public Opinion and Democracy”, “Freedom of Speech and Expression”, “Right to Information” and “Media and Social Responsibility”.
Award can be of many type. Many people of this class might have thought that award will be a form of visible object. But in my money, award for burning and sparking journalist like you all, should be something which should encourage you. As you know that what is the scenario of media in 21st century. Where you have to face lots of struggle in cutting edge from top to bottom.
This presentation was only a step towards show you people your ability. In coming time as you all will be aware about media industry, than only you able to know that which step should be taken to be a good journalist. This type of presentation will make you more competitive for the field of media. Don’t think what others think. Just go for whatever you need for polishing yourself.
Sitar Maestro Pundit Ravi Shankar is a unique personality from all aspects. He is completely devoted to the Indian classical music & Sitar. Once he said “I will keep making others feel hypnotized by its music till my life”. He quoted “I have taken each ups & downs of my life very easily. I accept new challenges everyday, even today”.
I have just put this example to boost up you all that if Ravi Shankar can accept new challenges in this age everyday, why not you people. You are the future for media. Now a days only those people sustain between cut throat competitions in media who has the guts to break the ice.
This type of learning experience and silent award will keep on moving whenever I am with you. I also don’t much aware what other members of this class think. The way of teaching may be something different what a traditional student think. But my ultimate goal is to make you all a good journalist and also a better competitor like a product of market by my experience.  It may be you don’t know the importance of this appreciation award this time, but keep it safely. It will work in future. 
Last and not the least I must say Make the Target and Hit the Target because you all have the potential to be a budding media person.


Thanking You
Sameer Srijan
Faculty,
Department of Journalism and Mass Communication,
Ranchi University, Ranchi

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नया साल 2011 मुबारक हो!

बीत गया जो साल भूल जाएँ, उस नये साल को गले लगाये,
करते हैं दुआ हम रब्ब से सर झुका के, इस साल के सारे सपने पूरे हो आपके!
नया साल 2011 मुबारक हो!

नया साल वही सवाल

चन्दन कुमार कौंडिल्य
एम
एमसी, 
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
रांची विश्वविद्यालयरांची 

नए साल की शुभकामना देने में कहीं देरी न हो जाये या सोचकर कुछ लिखने बैठा तो दिमाग के सेरेबेलम वाले हिस्से में न जाने कई तरह की भावनाएं, पीडाओं ने झंझावत मचाना शुरू कर या,औरनिजात  पाने का कोई तरीका नहीं सुझा तो लगा की चलो दिमागी खुराफात कर ही लूँ, लेकिन दोस्तों कुछ आगे लिखूं इससे पहले आपको नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ , और साथ में हार्दिक सहनुभुतियाँ भी क्योंकि मुझे लगता है की शुभकामनाओं से अधिक इनदिनों हमें सहनुभुतिओं की जरूरत है.क्या करेंगें हम नए साल में? यूँ तो कई तरीकों से हम नए वर्ष का स्वागत करतें है , लेकिन मेरा मुद्दा नए साल के स्वागत के तरीकों पर नहीं है बल्कि नए साल में हम खुद को किस रूप में देखना पसंद करेंगे,को लेकर है.
नए साल का स्वागत आखिर किस लिए किया जाता है ? और इसके स्वागत में सबसे अधिक जोश हम युवाओं में ही दिखाई पड़ता है तो इसका कारण क्या है?क्या हम बिना कुछ जाने समझे यूँ ही पश्चिमी अवाधारनाओं  का शिकार हो रहे है ?हम नया साल मना रहें हैं तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है लेकिन कमसे कम नए साल में हम युवा कुछ अच्छा  करने की प्रतिज्ञा तो लें. किसी भी देश की उन्नति और पतन में युवाओं का सबसे अहम् योगदान होता है.
तभी तो कहतें हैं
''जब सहर चुप हो हंसा लो हमको
जब अँधेरा हो जला लो हमको
खून का काम है रवां रहना
जिस जगह चाहो बहा लो हमको '

इसीलिए दोस्तों अपनी चारित्रिक गुणों को मजबूत बनायें और समाज में फ़ैल रहे अनैतिकताओं को रोकने  का भरसक प्रयास करें क्योंकि आज चारित्रिक पतन का शिकार भले ही सभी तबके के लोग हो रहें हो लेकिन इसका सबसे आसान शिकार हम युवा ही हैं वो इसलिए की किसी भी देश को यदि तोड़ना हो तो उसके रीढ़ को निशाना बनाया जाता है और भारत की रीढ़ हम युवा ही हैं .इसी के साथ की नए साल में हम अपने चारित्रिक गुणों का विकास करेंगें .एक बार फिर नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ विदा लूँगा.

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

क्या हम लक्ष्य विहीन हो गए हैं?


चन्दन कुमार कौंडिल्य
एम
एमसी, 
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
रांची विश्वविद्यालयरांची 

आज भारतीय मीडिया पर लगातार सवाल उठ रहें हैं तो इसमें विचलित होने जैसी कोई बात नहीं है. क्योंकि मेरा मानना है कि जब तक हमारे कार्य प्रणाली पर निगाहें नहीं रहेंगी हम बढ़िया काम की कोई गारंटी कैसी दे सकते हैं. जबकि आज बाजारवाद अपने चरम पर है, मीडिया के कार्यों पर सवाल उठाना शुभ संकेत 

माना जा सकता 

 हैं. इस बात में दम दीखता है कि चाहे कोई भी हो जनता उसे गलत नहीं करने देगी.भले ही मिडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हों, लेकिन हम जानते है कि इसे भी उतना ही अधिकार प्राप्त है जितना की एक आम आदमी को. 

इसके बावजूद मीडिया का इतना प्रभावी होना महज एक संयोग भर नहीं हो सकता है.आपको बता दूँ कि आज भले ही हमें क्लास रूम में ये पढाया जाता रहा है कि पत्रकारिता का असली मकसद लोगों को शिक्षित करना, सूचित करना और मनोरंजित करना है,मगर मात्र इतने भर से कोई माध्यम लोकतंत्र के लिए चौथे स्तम्भ का काम करने लगे ऐसी कोई बात नहीं है. बल्कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बनाने में इसके उदेश्यों, मकसदों ने अपना काम किया है. मै बता दूं कि शिक्षित करना, मनोरंजित और सूचित करना तो पत्रकारिता का आज का मकसद बन गए हैं, जबकि असली बात तो ये है कि उपर्युक्त तीनों ही हमें कहीं न कहीं पत्रकारिता के मूल उदेश्यों से भटका रहें हैं.

पत्रकारिता का काम क्या है? 

आज़ादी के पहले पत्रकारिता में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का ही योगदान था. कहने का मतलब है कि हमारे आज़ादी के दीवानों ने मीडिया को बतौर एक हथियार उपयोग किया और अंग्रेजों के पसीने निकाल दिए. ऐसा इसी कारण हो सका क्योंकि तब हमारी पत्रकारिता के सामने एक लक्ष्य था. हमें आज़ादी पाना था. लेकिन स्वतंत्र होते ही हम ने अपना और पत्रकारिता के मिशन को ख़त्म समझ लिया. जबकि वास्तविकता ये है कि पत्रकारिता का असली मकसद अब शुरू होना चाहिए था. क्योंकि आज़ादी का मतलब मात्र राजनीतिक बंधनों से मुक्ति भर नहीं होता है. असली मुक्ति तो तब होती है जब हम सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ हो जाएँ. और सांस्कृतिक सुदृढ़ता में हमारी पत्रकारिता का अहम योगदान हो सकता है.

पत्रकारिता जनमत निर्माण करे
जनमत निर्माण से मेरा मतलब है कि मिडिया किसी मुद्दे पर देश के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास करे और उन्हें अपने हितो के प्रति जागरूक करें. सिर्फ सुचना देने मात्र से उसका काम ख़त्म हो गया ये नहीं हो. जिस तरह से हमें पत्रकारिता में टेक्नीकल बातें ही मात्र बतायी जाती हैं,बजाय इसके की हमें पत्रकारिता के जन सरोकारों से सम्बंधित बातें बतायी जाएँ. ये इशारा करती है कि भले ही व्यवसाय की नज़र में इसे ठीक समझा जा रहा हो लेकिन कदाचित ही ये भारतीय पत्रकारिता के लिए बहुत नुकसानदेह है.बड़े बड़े व्यावसायिक घरानों का रुझान ये बताता है कि पत्रकारिता आज एक उद्योग बन गया है लेकिन हमें इसके उद्योग बनाने से ज्यादा परेशानी नहीं है जितना की इसके लक्ष्यविहीनता से है.