सोमवार, 27 दिसंबर 2010

क्या हम लक्ष्य विहीन हो गए हैं?


चन्दन कुमार कौंडिल्य
एम
एमसी, 
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
रांची विश्वविद्यालयरांची 

आज भारतीय मीडिया पर लगातार सवाल उठ रहें हैं तो इसमें विचलित होने जैसी कोई बात नहीं है. क्योंकि मेरा मानना है कि जब तक हमारे कार्य प्रणाली पर निगाहें नहीं रहेंगी हम बढ़िया काम की कोई गारंटी कैसी दे सकते हैं. जबकि आज बाजारवाद अपने चरम पर है, मीडिया के कार्यों पर सवाल उठाना शुभ संकेत 

माना जा सकता 

 हैं. इस बात में दम दीखता है कि चाहे कोई भी हो जनता उसे गलत नहीं करने देगी.भले ही मिडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हों, लेकिन हम जानते है कि इसे भी उतना ही अधिकार प्राप्त है जितना की एक आम आदमी को. 

इसके बावजूद मीडिया का इतना प्रभावी होना महज एक संयोग भर नहीं हो सकता है.आपको बता दूँ कि आज भले ही हमें क्लास रूम में ये पढाया जाता रहा है कि पत्रकारिता का असली मकसद लोगों को शिक्षित करना, सूचित करना और मनोरंजित करना है,मगर मात्र इतने भर से कोई माध्यम लोकतंत्र के लिए चौथे स्तम्भ का काम करने लगे ऐसी कोई बात नहीं है. बल्कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बनाने में इसके उदेश्यों, मकसदों ने अपना काम किया है. मै बता दूं कि शिक्षित करना, मनोरंजित और सूचित करना तो पत्रकारिता का आज का मकसद बन गए हैं, जबकि असली बात तो ये है कि उपर्युक्त तीनों ही हमें कहीं न कहीं पत्रकारिता के मूल उदेश्यों से भटका रहें हैं.

पत्रकारिता का काम क्या है? 

आज़ादी के पहले पत्रकारिता में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का ही योगदान था. कहने का मतलब है कि हमारे आज़ादी के दीवानों ने मीडिया को बतौर एक हथियार उपयोग किया और अंग्रेजों के पसीने निकाल दिए. ऐसा इसी कारण हो सका क्योंकि तब हमारी पत्रकारिता के सामने एक लक्ष्य था. हमें आज़ादी पाना था. लेकिन स्वतंत्र होते ही हम ने अपना और पत्रकारिता के मिशन को ख़त्म समझ लिया. जबकि वास्तविकता ये है कि पत्रकारिता का असली मकसद अब शुरू होना चाहिए था. क्योंकि आज़ादी का मतलब मात्र राजनीतिक बंधनों से मुक्ति भर नहीं होता है. असली मुक्ति तो तब होती है जब हम सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ हो जाएँ. और सांस्कृतिक सुदृढ़ता में हमारी पत्रकारिता का अहम योगदान हो सकता है.

पत्रकारिता जनमत निर्माण करे
जनमत निर्माण से मेरा मतलब है कि मिडिया किसी मुद्दे पर देश के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास करे और उन्हें अपने हितो के प्रति जागरूक करें. सिर्फ सुचना देने मात्र से उसका काम ख़त्म हो गया ये नहीं हो. जिस तरह से हमें पत्रकारिता में टेक्नीकल बातें ही मात्र बतायी जाती हैं,बजाय इसके की हमें पत्रकारिता के जन सरोकारों से सम्बंधित बातें बतायी जाएँ. ये इशारा करती है कि भले ही व्यवसाय की नज़र में इसे ठीक समझा जा रहा हो लेकिन कदाचित ही ये भारतीय पत्रकारिता के लिए बहुत नुकसानदेह है.बड़े बड़े व्यावसायिक घरानों का रुझान ये बताता है कि पत्रकारिता आज एक उद्योग बन गया है लेकिन हमें इसके उद्योग बनाने से ज्यादा परेशानी नहीं है जितना की इसके लक्ष्यविहीनता से है.
 

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