बीत गया जो साल भूल जाएँ, उस नये साल को गले लगाये,
करते हैं दुआ हम रब्ब से सर झुका के, इस साल के सारे सपने पूरे हो आपके!
नया साल 2011 मुबारक हो!
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
नया साल वही सवाल
चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमएमसी, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,रांची विश्वविद्यालय, रांची
नए साल की शुभकामना देने में कहीं देरी न हो जाये या सोचकर कुछ लिखने बैठा तो दिमाग के सेरेबेलम वाले हिस्से में न जाने कई तरह की भावनाएं, पीडाओं ने झंझावत मचाना शुरू कर या,औरनिजात पाने का कोई तरीका नहीं सुझा तो लगा की चलो दिमागी खुराफात कर ही लूँ, लेकिन दोस्तों कुछ आगे लिखूं इससे पहले आपको नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ , और साथ में हार्दिक सहनुभुतियाँ भी क्योंकि मुझे लगता है की शुभकामनाओं से अधिक इनदिनों हमें सहनुभुतिओं की जरूरत है.क्या करेंगें हम नए साल में? यूँ तो कई तरीकों से हम नए वर्ष का स्वागत करतें है , लेकिन मेरा मुद्दा नए साल के स्वागत के तरीकों पर नहीं है बल्कि नए साल में हम खुद को किस रूप में देखना पसंद करेंगे,को लेकर है.नए साल का स्वागत आखिर किस लिए किया जाता है ? और इसके स्वागत में सबसे अधिक जोश हम युवाओं में ही दिखाई पड़ता है तो इसका कारण क्या है?क्या हम बिना कुछ जाने समझे यूँ ही पश्चिमी अवाधारनाओं का शिकार हो रहे है ?हम नया साल मना रहें हैं तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है लेकिन कमसे कम नए साल में हम युवा कुछ अच्छा करने की प्रतिज्ञा तो लें. किसी भी देश की उन्नति और पतन में युवाओं का सबसे अहम् योगदान होता है.
तभी तो कहतें हैं
''जब सहर चुप हो हंसा लो हमको
जब अँधेरा हो जला लो हमको
खून का काम है रवां रहना
जिस जगह चाहो बहा लो हमको '
इसीलिए दोस्तों अपनी चारित्रिक गुणों को मजबूत बनायें और समाज में फ़ैल रहे अनैतिकताओं को रोकने का भरसक प्रयास करें क्योंकि आज चारित्रिक पतन का शिकार भले ही सभी तबके के लोग हो रहें हो लेकिन इसका सबसे आसान शिकार हम युवा ही हैं वो इसलिए की किसी भी देश को यदि तोड़ना हो तो उसके रीढ़ को निशाना बनाया जाता है और भारत की रीढ़ हम युवा ही हैं .इसी के साथ की नए साल में हम अपने चारित्रिक गुणों का विकास करेंगें .एक बार फिर नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ विदा लूँगा.
एमएमसी,
नए साल की शुभकामना देने में कहीं देरी न हो जाये या सोचकर कुछ लिखने बैठा तो दिमाग के सेरेबेलम वाले हिस्से में न जाने कई तरह की भावनाएं, पीडाओं ने झंझावत मचाना शुरू कर या,औरनिजात पाने का कोई तरीका नहीं सुझा तो लगा की चलो दिमागी खुराफात कर ही लूँ, लेकिन दोस्तों कुछ आगे लिखूं इससे पहले आपको नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ , और साथ में हार्दिक सहनुभुतियाँ भी क्योंकि मुझे लगता है की शुभकामनाओं से अधिक इनदिनों हमें सहनुभुतिओं की जरूरत है.क्या करेंगें हम नए साल में? यूँ तो कई तरीकों से हम नए वर्ष का स्वागत करतें है , लेकिन मेरा मुद्दा नए साल के स्वागत के तरीकों पर नहीं है बल्कि नए साल में हम खुद को किस रूप में देखना पसंद करेंगे,को लेकर है.
तभी तो कहतें हैं
''जब सहर चुप हो हंसा लो हमको
जब अँधेरा हो जला लो हमको
खून का काम है रवां रहना
जिस जगह चाहो बहा लो हमको '
इसीलिए दोस्तों अपनी चारित्रिक गुणों को मजबूत बनायें और समाज में फ़ैल रहे अनैतिकताओं को रोकने का भरसक प्रयास करें क्योंकि आज चारित्रिक पतन का शिकार भले ही सभी तबके के लोग हो रहें हो लेकिन इसका सबसे आसान शिकार हम युवा ही हैं वो इसलिए की किसी भी देश को यदि तोड़ना हो तो उसके रीढ़ को निशाना बनाया जाता है और भारत की रीढ़ हम युवा ही हैं .इसी के साथ की नए साल में हम अपने चारित्रिक गुणों का विकास करेंगें .एक बार फिर नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ विदा लूँगा.
सोमवार, 27 दिसंबर 2010
क्या हम लक्ष्य विहीन हो गए हैं?
चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमएमसी, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,रांची विश्वविद्यालय, रांची
एमएमसी,
आज भारतीय मीडिया पर लगातार सवाल उठ रहें हैं तो इसमें विचलित होने जैसी कोई बात नहीं है. क्योंकि मेरा मानना है कि जब तक हमारे कार्य प्रणाली पर निगाहें नहीं रहेंगी हम बढ़िया काम की कोई गारंटी कैसी दे सकते हैं. जबकि आज बाजारवाद अपने चरम पर है, मीडिया के कार्यों पर सवाल उठाना शुभ संकेत माना जा सकता
हैं. इस बात में दम दीखता है कि चाहे कोई भी हो जनता उसे गलत नहीं करने देगी.भले ही मिडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हों, लेकिन हम जानते है कि इसे भी उतना ही अधिकार प्राप्त है जितना की एक आम आदमी को.
इसके बावजूद मीडिया का इतना प्रभावी होना महज एक संयोग भर नहीं हो सकता है.आपको बता दूँ कि आज भले ही हमें क्लास रूम में ये पढाया जाता रहा है कि पत्रकारिता का असली मकसद लोगों को शिक्षित करना, सूचित करना और मनोरंजित करना है,मगर मात्र इतने भर से कोई माध्यम लोकतंत्र के लिए चौथे स्तम्भ का काम करने लगे ऐसी कोई बात नहीं है. बल्कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बनाने में इसके उदेश्यों, मकसदों ने अपना काम किया है. मै बता दूं कि शिक्षित करना, मनोरंजित और सूचित करना तो पत्रकारिता का आज का मकसद बन गए हैं, जबकि असली बात तो ये है कि उपर्युक्त तीनों ही हमें कहीं न कहीं पत्रकारिता के मूल उदेश्यों से भटका रहें हैं.
पत्रकारिता का काम क्या है?
आज़ादी के पहले पत्रकारिता में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का ही योगदान था. कहने का मतलब है कि हमारे आज़ादी के दीवानों ने मीडिया को बतौर एक हथियार उपयोग किया और अंग्रेजों के पसीने निकाल दिए. ऐसा इसी कारण हो सका क्योंकि तब हमारी पत्रकारिता के सामने एक लक्ष्य था. हमें आज़ादी पाना था. लेकिन स्वतंत्र होते ही हम ने अपना और पत्रकारिता के मिशन को ख़त्म समझ लिया. जबकि वास्तविकता ये है कि पत्रकारिता का असली मकसद अब शुरू होना चाहिए था. क्योंकि आज़ादी का मतलब मात्र राजनीतिक बंधनों से मुक्ति भर नहीं होता है. असली मुक्ति तो तब होती है जब हम सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ हो जाएँ. और सांस्कृतिक सुदृढ़ता में हमारी पत्रकारिता का अहम योगदान हो सकता है.
पत्रकारिता जनमत निर्माण करे
जनमत निर्माण से मेरा मतलब है कि मिडिया किसी मुद्दे पर देश के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास करे और उन्हें अपने हितो के प्रति जागरूक करें. सिर्फ सुचना देने मात्र से उसका काम ख़त्म हो गया ये नहीं हो. जिस तरह से हमें पत्रकारिता में टेक्नीकल बातें ही मात्र बतायी जाती हैं,बजाय इसके की हमें पत्रकारिता के जन सरोकारों से सम्बंधित बातें बतायी जाएँ. ये इशारा करती है कि भले ही व्यवसाय की नज़र में इसे ठीक समझा जा रहा हो लेकिन कदाचित ही ये भारतीय पत्रकारिता के लिए बहुत नुकसानदेह है.बड़े बड़े व्यावसायिक घरानों का रुझान ये बताता है कि पत्रकारिता आज एक उद्योग बन गया है लेकिन हमें इसके उद्योग बनाने से ज्यादा परेशानी नहीं है जितना की इसके लक्ष्यविहीनता से है.
गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
चिंदी चिदंबरम . काहे की लड़ाई?
चिंदी चिदंबरम
भारत के गृह मंत्री का किसी मुद्दे पर वह बयान कि दिल्ली में बढ़ रहे अपराधों का कारण बाहरी राज्यों के वे लोग हैं जो अवैध रूप से झुग्गी झोपड़ियां बनाकर रहने लगे है, .अन्तर्मन को विचलित कर जाती है, हम ये सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि गृह मंत्री की कुर्सी पर बैठे चिदंबरम नामक शख्स क्या सचमुच भारत के ही गृहमंत्री है? यदि ऐसा है तो मुझे प्रेमचंद की वो लाइन याद आ रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की आजादी का ऐसे में कोई मतलब नहीं बनता है यदि जौन की जगह गोविन्द बैठ जाए.हम यहां चिदंबरम के बयान को अरुंधती राय के उस बयान से तुलना कर सकते हैं जिसे उन्होंने कुछ दिनों पहले दिया था कि ''कश्मीर भारत का कभी भी अभिन्न अंग नहीं रहा है इसलिए उसे अलग कर देना चाहिए''.
भारत के गृह मंत्री का किसी मुद्दे पर वह बयान कि दिल्ली में बढ़ रहे अपराधों का कारण बाहरी राज्यों के वे लोग हैं जो अवैध रूप से झुग्गी झोपड़ियां बनाकर रहने लगे है, .अन्तर्मन को विचलित कर जाती है, हम ये सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि गृह मंत्री की कुर्सी पर बैठे चिदंबरम नामक शख्स क्या सचमुच भारत के ही गृहमंत्री है? यदि ऐसा है तो मुझे प्रेमचंद की वो लाइन याद आ रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की आजादी का ऐसे में कोई मतलब नहीं बनता है यदि जौन की जगह गोविन्द बैठ जाए.हम यहां चिदंबरम के बयान को अरुंधती राय के उस बयान से तुलना कर सकते हैं जिसे उन्होंने कुछ दिनों पहले दिया था कि ''कश्मीर भारत का कभी भी अभिन्न अंग नहीं रहा है इसलिए उसे अलग कर देना चाहिए''.
आखिर दोनों बयानों में क्या समानता है? भारत को बाटनें के नजरिये से दोनों बयान सटीक हैं. इसका मतलब है कि चिदंबरम साहब और अरुंधती दोनों के बयान एक जैसे ही हैं. भारत के संविधान में वैसी कोई बात जो इसके अखंडता को प्रभावित करता है तो ऐसा करने वाले शख्स पर देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जाना चाहिए. दुःख तो इस बात की है कि हर बार की तरह हम से सहानुभूति दिखाने वाले तथाकथित नेता ही हमारे हितों से खेल रहें है.
अरुंधती का कश्मीर मुद्दे पर दिया गया बयान भले ही पर्सनल हो सकता है लेकिन गृह मंत्री का ऐसा बयान कभी भी पर्सनल इसलिए नहीं हो सकता कि वो भारत के जनता को रिप्रेसेन्ट करता है. ऐसे में चिदंबरम जी पर एक्शन लेना चाहिए ये बात तो प्रधानमंत्री भली भांति समझे हैं.
अरुंधती का कश्मीर मुद्दे पर दिया गया बयान भले ही पर्सनल हो सकता है लेकिन गृह मंत्री का ऐसा बयान कभी भी पर्सनल इसलिए नहीं हो सकता कि वो भारत के जनता को रिप्रेसेन्ट करता है. ऐसे में चिदंबरम जी पर एक्शन लेना चाहिए ये बात तो प्रधानमंत्री भली भांति समझे हैं.
काहे की लड़ाई?
आजकल दुनिया भर में क्षेत्रवाद, बंटवारा, आदि की लडाइयां चल रही हैं, लेकिन कभी किसी ने शायद ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर इन लड़ाइयों का कारण क्या है? काफी तफ्तीश के बाद इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि देशों के बीच सीमा की लड़ाई चाहे भारत-पकिस्तान में कश्मीर मुद्दा. अमेरिका अफगानिस्तान ईराक आदि मुद्दें हों. भले ही देश की अखंडता को बचने की जैसी बातें करके लड़ी जा रही हों, लेकिन इसके पीछे वास्तविक कारण कुछ और है.इस बात को समझाने के लिए हमें कश्मीर मुद्दे पर आना पड़ेगा.
आजकल दुनिया भर में क्षेत्रवाद, बंटवारा, आदि की लडाइयां चल रही हैं, लेकिन कभी किसी ने शायद ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर इन लड़ाइयों का कारण क्या है? काफी तफ्तीश के बाद इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि देशों के बीच सीमा की लड़ाई चाहे भारत-पकिस्तान में कश्मीर मुद्दा. अमेरिका अफगानिस्तान ईराक आदि मुद्दें हों. भले ही देश की अखंडता को बचने की जैसी बातें करके लड़ी जा रही हों, लेकिन इसके पीछे वास्तविक कारण कुछ और है.इस बात को समझाने के लिए हमें कश्मीर मुद्दे पर आना पड़ेगा.
क्या कश्मीर मुद्दा कभी हल हो पायेगा?
भले ही इस प्रश्न का उत्तर बड़े से बड़ा नेता और ब्यूरोक्रेट्स देने में घबरातें हों लेकिन सच मानिए दोस्तों इसका जवाब आम आदमी भी जानता है और बड़े बिंदास होकर कहता है कि दुनियां चाही इधर की उधर हो जाए लेकिन कश्मीर समस्या कभी हल नहीं हो सकता. क्यों?
वो इसलिए की विकसित देशों की एक तिहाई से भी अधिक की राशि हथियारों के निर्माण में खर्च होती है. जब हर साल उनके पास भारी मात्रा में हथियार जमा हो जाते हैं तो वो दुसरे कमजोर देशों पर दबाव बनाकर उन्हें
हथियारों को खरीदने के लिए मजबूर कर देते हैं . ऐसे में जब भारत और पाकिस्तान जैसे देश प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में हथियार खरीदते हैं तो उन्हें भी इसे खपाने की जरूरत महसूस होती है ऐसे में इन हथियारों को सीमा
पर खपाया जाता है.
भले ही इस प्रश्न का उत्तर बड़े से बड़ा नेता और ब्यूरोक्रेट्स देने में घबरातें हों लेकिन सच मानिए दोस्तों इसका जवाब आम आदमी भी जानता है और बड़े बिंदास होकर कहता है कि दुनियां चाही इधर की उधर हो जाए लेकिन कश्मीर समस्या कभी हल नहीं हो सकता. क्यों?
वो इसलिए की विकसित देशों की एक तिहाई से भी अधिक की राशि हथियारों के निर्माण में खर्च होती है. जब हर साल उनके पास भारी मात्रा में हथियार जमा हो जाते हैं तो वो दुसरे कमजोर देशों पर दबाव बनाकर उन्हें
हथियारों को खरीदने के लिए मजबूर कर देते हैं . ऐसे में जब भारत और पाकिस्तान जैसे देश प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में हथियार खरीदते हैं तो उन्हें भी इसे खपाने की जरूरत महसूस होती है ऐसे में इन हथियारों को सीमा
पर खपाया जाता है.
चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमएमसी,
एमएमसी,
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
रांची विश्वविद्यालय, रांची
मंगलवार, 7 दिसंबर 2010
दोस्तों खबरों के ठेकेदार रस्ते में मिल गए...
चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमए. पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
रांची विश्वविद्यालय, रांची
मीडिया आज देश में बदलाव की बयार बहा रहा है. इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज गूंगों ने जब बोलने की बेचैनी दिखाई है, तो आराम फरमा रहे लोगों में भी अपनी चैन छीन जाने का डर हो गया है.जिससे कई ऐसी चीजें हमारे सामने आ रही है जिन पर एक बार में सहसा विश्वास करने का मन नहीं होता है. भारत के लोग बड़े भोले भले होते हैं ये सदियों से कहा जाता रहा है लेकिन मेरा मानना ऐसा कतई नहीं है. वो इसलिए कि आज बात चाहे भारत की हो या किसी दुसरे देश की, जहाँ भी ''लोग या लोगों ''की बात आती है वो सभी भोले भाले ही होते हैं. सीधे शब्दों में मै ये कहना चाहता हूँ कि यदि पॉवर के खेल में किसी शख्स को पॉवर दे दी जाये तो वो सबसे पहले अपना और अपने परिवार को सुरक्षित कर लेना चाहेगा.
ये अलग बात है कि उस आदमी की ये सुरक्षित अन्य लोगों लिए क्या मायने रखते हैं. हाँ बात उस जगह जाकर सवाल खड़ी करती है कि हमारा महत्व समाज के लिए क्या है और हम समाज को क्या दे रहें हैं? यदि हम मीडिया को समाज का आईना कहते हैं तो समाज मीडिया से ये अपेक्षा रखती है कि उसका आईना इतना साफ जरूर हो जिसमें वो अपना चेहरा या छवि साफ साफ देख सके. नीरा राडिया प्रकरण से काफी हद तक पर्दा उठ गया है और हमने कई धपोरशंखों को भी पहचान लिया है . भाई इस प्रकरण पर मेरा कुछ लिखने का मन हुआ तो मन में चंद पंक्तियाँ सूझी -
ये कैसे कैसे लोग देखो चोटी पर पहुँच गए
हमें बेचने निकले थे और खुद ही बिक गए...
शोरे पैहम मचाया है सहर में खूब ईमानदारी का
बेईमानों से चालबाजियां और देखो क्या क्या सीख गए..
वादा किया था महरूमों से आवाज़ उठाऊंगा उनकी
खबरों के ठेकेदार मगर दोस्तों रस्ते में मिल गए...
बहुत महंगें हैं दाल चावल भूखे हैं लोग यहाँ
इस बाज़ार में यूँ ही हम किसी को सस्ते में मिल गए...
एमए. पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
रांची विश्वविद्यालय, रांची
मीडिया आज देश में बदलाव की बयार बहा रहा है. इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज गूंगों ने जब बोलने की बेचैनी दिखाई है, तो आराम फरमा रहे लोगों में भी अपनी चैन छीन जाने का डर हो गया है.जिससे कई ऐसी चीजें हमारे सामने आ रही है जिन पर एक बार में सहसा विश्वास करने का मन नहीं होता है. भारत के लोग बड़े भोले भले होते हैं ये सदियों से कहा जाता रहा है लेकिन मेरा मानना ऐसा कतई नहीं है. वो इसलिए कि आज बात चाहे भारत की हो या किसी दुसरे देश की, जहाँ भी ''लोग या लोगों ''की बात आती है वो सभी भोले भाले ही होते हैं. सीधे शब्दों में मै ये कहना चाहता हूँ कि यदि पॉवर के खेल में किसी शख्स को पॉवर दे दी जाये तो वो सबसे पहले अपना और अपने परिवार को सुरक्षित कर लेना चाहेगा.
ये अलग बात है कि उस आदमी की ये सुरक्षित अन्य लोगों लिए क्या मायने रखते हैं. हाँ बात उस जगह जाकर सवाल खड़ी करती है कि हमारा महत्व समाज के लिए क्या है और हम समाज को क्या दे रहें हैं? यदि हम मीडिया को समाज का आईना कहते हैं तो समाज मीडिया से ये अपेक्षा रखती है कि उसका आईना इतना साफ जरूर हो जिसमें वो अपना चेहरा या छवि साफ साफ देख सके. नीरा राडिया प्रकरण से काफी हद तक पर्दा उठ गया है और हमने कई धपोरशंखों को भी पहचान लिया है . भाई इस प्रकरण पर मेरा कुछ लिखने का मन हुआ तो मन में चंद पंक्तियाँ सूझी -
ये कैसे कैसे लोग देखो चोटी पर पहुँच गए
हमें बेचने निकले थे और खुद ही बिक गए...
शोरे पैहम मचाया है सहर में खूब ईमानदारी का
बेईमानों से चालबाजियां और देखो क्या क्या सीख गए..
वादा किया था महरूमों से आवाज़ उठाऊंगा उनकी
खबरों के ठेकेदार मगर दोस्तों रस्ते में मिल गए...
बहुत महंगें हैं दाल चावल भूखे हैं लोग यहाँ
इस बाज़ार में यूँ ही हम किसी को सस्ते में मिल गए...
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