चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमएमसी, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,रांची विश्वविद्यालय, रांची
नए साल की शुभकामना देने में कहीं देरी न हो जाये या सोचकर कुछ लिखने बैठा तो दिमाग के सेरेबेलम वाले हिस्से में न जाने कई तरह की भावनाएं, पीडाओं ने झंझावत मचाना शुरू कर या,औरनिजात पाने का कोई तरीका नहीं सुझा तो लगा की चलो दिमागी खुराफात कर ही लूँ, लेकिन दोस्तों कुछ आगे लिखूं इससे पहले आपको नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ , और साथ में हार्दिक सहनुभुतियाँ भी क्योंकि मुझे लगता है की शुभकामनाओं से अधिक इनदिनों हमें सहनुभुतिओं की जरूरत है.क्या करेंगें हम नए साल में? यूँ तो कई तरीकों से हम नए वर्ष का स्वागत करतें है , लेकिन मेरा मुद्दा नए साल के स्वागत के तरीकों पर नहीं है बल्कि नए साल में हम खुद को किस रूप में देखना पसंद करेंगे,को लेकर है.नए साल का स्वागत आखिर किस लिए किया जाता है ? और इसके स्वागत में सबसे अधिक जोश हम युवाओं में ही दिखाई पड़ता है तो इसका कारण क्या है?क्या हम बिना कुछ जाने समझे यूँ ही पश्चिमी अवाधारनाओं का शिकार हो रहे है ?हम नया साल मना रहें हैं तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है लेकिन कमसे कम नए साल में हम युवा कुछ अच्छा करने की प्रतिज्ञा तो लें. किसी भी देश की उन्नति और पतन में युवाओं का सबसे अहम् योगदान होता है.
तभी तो कहतें हैं
''जब सहर चुप हो हंसा लो हमको
जब अँधेरा हो जला लो हमको
खून का काम है रवां रहना
जिस जगह चाहो बहा लो हमको '
इसीलिए दोस्तों अपनी चारित्रिक गुणों को मजबूत बनायें और समाज में फ़ैल रहे अनैतिकताओं को रोकने का भरसक प्रयास करें क्योंकि आज चारित्रिक पतन का शिकार भले ही सभी तबके के लोग हो रहें हो लेकिन इसका सबसे आसान शिकार हम युवा ही हैं वो इसलिए की किसी भी देश को यदि तोड़ना हो तो उसके रीढ़ को निशाना बनाया जाता है और भारत की रीढ़ हम युवा ही हैं .इसी के साथ की नए साल में हम अपने चारित्रिक गुणों का विकास करेंगें .एक बार फिर नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ विदा लूँगा.
एमएमसी,
नए साल की शुभकामना देने में कहीं देरी न हो जाये या सोचकर कुछ लिखने बैठा तो दिमाग के सेरेबेलम वाले हिस्से में न जाने कई तरह की भावनाएं, पीडाओं ने झंझावत मचाना शुरू कर या,औरनिजात पाने का कोई तरीका नहीं सुझा तो लगा की चलो दिमागी खुराफात कर ही लूँ, लेकिन दोस्तों कुछ आगे लिखूं इससे पहले आपको नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ , और साथ में हार्दिक सहनुभुतियाँ भी क्योंकि मुझे लगता है की शुभकामनाओं से अधिक इनदिनों हमें सहनुभुतिओं की जरूरत है.क्या करेंगें हम नए साल में? यूँ तो कई तरीकों से हम नए वर्ष का स्वागत करतें है , लेकिन मेरा मुद्दा नए साल के स्वागत के तरीकों पर नहीं है बल्कि नए साल में हम खुद को किस रूप में देखना पसंद करेंगे,को लेकर है.
तभी तो कहतें हैं
''जब सहर चुप हो हंसा लो हमको
जब अँधेरा हो जला लो हमको
खून का काम है रवां रहना
जिस जगह चाहो बहा लो हमको '
इसीलिए दोस्तों अपनी चारित्रिक गुणों को मजबूत बनायें और समाज में फ़ैल रहे अनैतिकताओं को रोकने का भरसक प्रयास करें क्योंकि आज चारित्रिक पतन का शिकार भले ही सभी तबके के लोग हो रहें हो लेकिन इसका सबसे आसान शिकार हम युवा ही हैं वो इसलिए की किसी भी देश को यदि तोड़ना हो तो उसके रीढ़ को निशाना बनाया जाता है और भारत की रीढ़ हम युवा ही हैं .इसी के साथ की नए साल में हम अपने चारित्रिक गुणों का विकास करेंगें .एक बार फिर नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ विदा लूँगा.

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