भारत के गृह मंत्री का किसी मुद्दे पर वह बयान कि दिल्ली में बढ़ रहे अपराधों का कारण बाहरी राज्यों के वे लोग हैं जो अवैध रूप से झुग्गी झोपड़ियां बनाकर रहने लगे है, .अन्तर्मन को विचलित कर जाती है, हम ये सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि गृह मंत्री की कुर्सी पर बैठे चिदंबरम नामक शख्स क्या सचमुच भारत के ही गृहमंत्री है? यदि ऐसा है तो मुझे प्रेमचंद की वो लाइन याद आ रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की आजादी का ऐसे में कोई मतलब नहीं बनता है यदि जौन की जगह गोविन्द बैठ जाए.हम यहां चिदंबरम के बयान को अरुंधती राय के उस बयान से तुलना कर सकते हैं जिसे उन्होंने कुछ दिनों पहले दिया था कि ''कश्मीर भारत का कभी भी अभिन्न अंग नहीं रहा है इसलिए उसे अलग कर देना चाहिए''.
आखिर दोनों बयानों में क्या समानता है? भारत को बाटनें के नजरिये से दोनों बयान सटीक हैं. इसका मतलब है कि चिदंबरम साहब और अरुंधती दोनों के बयान एक जैसे ही हैं. भारत के संविधान में वैसी कोई बात जो इसके अखंडता को प्रभावित करता है तो ऐसा करने वाले शख्स पर देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जाना चाहिए. दुःख तो इस बात की है कि हर बार की तरह हम से सहानुभूति दिखाने वाले तथाकथित नेता ही हमारे हितों से खेल रहें है.
अरुंधती का कश्मीर मुद्दे पर दिया गया बयान भले ही पर्सनल हो सकता है लेकिन गृह मंत्री का ऐसा बयान कभी भी पर्सनल इसलिए नहीं हो सकता कि वो भारत के जनता को रिप्रेसेन्ट करता है. ऐसे में चिदंबरम जी पर एक्शन लेना चाहिए ये बात तो प्रधानमंत्री भली भांति समझे हैं.
अरुंधती का कश्मीर मुद्दे पर दिया गया बयान भले ही पर्सनल हो सकता है लेकिन गृह मंत्री का ऐसा बयान कभी भी पर्सनल इसलिए नहीं हो सकता कि वो भारत के जनता को रिप्रेसेन्ट करता है. ऐसे में चिदंबरम जी पर एक्शन लेना चाहिए ये बात तो प्रधानमंत्री भली भांति समझे हैं.
काहे की लड़ाई?
आजकल दुनिया भर में क्षेत्रवाद, बंटवारा, आदि की लडाइयां चल रही हैं, लेकिन कभी किसी ने शायद ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर इन लड़ाइयों का कारण क्या है? काफी तफ्तीश के बाद इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि देशों के बीच सीमा की लड़ाई चाहे भारत-पकिस्तान में कश्मीर मुद्दा. अमेरिका अफगानिस्तान ईराक आदि मुद्दें हों. भले ही देश की अखंडता को बचने की जैसी बातें करके लड़ी जा रही हों, लेकिन इसके पीछे वास्तविक कारण कुछ और है.इस बात को समझाने के लिए हमें कश्मीर मुद्दे पर आना पड़ेगा.
आजकल दुनिया भर में क्षेत्रवाद, बंटवारा, आदि की लडाइयां चल रही हैं, लेकिन कभी किसी ने शायद ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर इन लड़ाइयों का कारण क्या है? काफी तफ्तीश के बाद इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि देशों के बीच सीमा की लड़ाई चाहे भारत-पकिस्तान में कश्मीर मुद्दा. अमेरिका अफगानिस्तान ईराक आदि मुद्दें हों. भले ही देश की अखंडता को बचने की जैसी बातें करके लड़ी जा रही हों, लेकिन इसके पीछे वास्तविक कारण कुछ और है.इस बात को समझाने के लिए हमें कश्मीर मुद्दे पर आना पड़ेगा.
क्या कश्मीर मुद्दा कभी हल हो पायेगा?
भले ही इस प्रश्न का उत्तर बड़े से बड़ा नेता और ब्यूरोक्रेट्स देने में घबरातें हों लेकिन सच मानिए दोस्तों इसका जवाब आम आदमी भी जानता है और बड़े बिंदास होकर कहता है कि दुनियां चाही इधर की उधर हो जाए लेकिन कश्मीर समस्या कभी हल नहीं हो सकता. क्यों?
वो इसलिए की विकसित देशों की एक तिहाई से भी अधिक की राशि हथियारों के निर्माण में खर्च होती है. जब हर साल उनके पास भारी मात्रा में हथियार जमा हो जाते हैं तो वो दुसरे कमजोर देशों पर दबाव बनाकर उन्हें
हथियारों को खरीदने के लिए मजबूर कर देते हैं . ऐसे में जब भारत और पाकिस्तान जैसे देश प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में हथियार खरीदते हैं तो उन्हें भी इसे खपाने की जरूरत महसूस होती है ऐसे में इन हथियारों को सीमा
पर खपाया जाता है.
भले ही इस प्रश्न का उत्तर बड़े से बड़ा नेता और ब्यूरोक्रेट्स देने में घबरातें हों लेकिन सच मानिए दोस्तों इसका जवाब आम आदमी भी जानता है और बड़े बिंदास होकर कहता है कि दुनियां चाही इधर की उधर हो जाए लेकिन कश्मीर समस्या कभी हल नहीं हो सकता. क्यों?
वो इसलिए की विकसित देशों की एक तिहाई से भी अधिक की राशि हथियारों के निर्माण में खर्च होती है. जब हर साल उनके पास भारी मात्रा में हथियार जमा हो जाते हैं तो वो दुसरे कमजोर देशों पर दबाव बनाकर उन्हें
हथियारों को खरीदने के लिए मजबूर कर देते हैं . ऐसे में जब भारत और पाकिस्तान जैसे देश प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में हथियार खरीदते हैं तो उन्हें भी इसे खपाने की जरूरत महसूस होती है ऐसे में इन हथियारों को सीमा
पर खपाया जाता है.
चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमएमसी,
एमएमसी,
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
रांची विश्वविद्यालय, रांची

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें