चन्दन कुमार कौंडिल्य
एमए. पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
रांची विश्वविद्यालय, रांची
मीडिया आज देश में बदलाव की बयार बहा रहा है. इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज गूंगों ने जब बोलने की बेचैनी दिखाई है, तो आराम फरमा रहे लोगों में भी अपनी चैन छीन जाने का डर हो गया है.जिससे कई ऐसी चीजें हमारे सामने आ रही है जिन पर एक बार में सहसा विश्वास करने का मन नहीं होता है. भारत के लोग बड़े भोले भले होते हैं ये सदियों से कहा जाता रहा है लेकिन मेरा मानना ऐसा कतई नहीं है. वो इसलिए कि आज बात चाहे भारत की हो या किसी दुसरे देश की, जहाँ भी ''लोग या लोगों ''की बात आती है वो सभी भोले भाले ही होते हैं. सीधे शब्दों में मै ये कहना चाहता हूँ कि यदि पॉवर के खेल में किसी शख्स को पॉवर दे दी जाये तो वो सबसे पहले अपना और अपने परिवार को सुरक्षित कर लेना चाहेगा.
ये अलग बात है कि उस आदमी की ये सुरक्षित अन्य लोगों लिए क्या मायने रखते हैं. हाँ बात उस जगह जाकर सवाल खड़ी करती है कि हमारा महत्व समाज के लिए क्या है और हम समाज को क्या दे रहें हैं? यदि हम मीडिया को समाज का आईना कहते हैं तो समाज मीडिया से ये अपेक्षा रखती है कि उसका आईना इतना साफ जरूर हो जिसमें वो अपना चेहरा या छवि साफ साफ देख सके. नीरा राडिया प्रकरण से काफी हद तक पर्दा उठ गया है और हमने कई धपोरशंखों को भी पहचान लिया है . भाई इस प्रकरण पर मेरा कुछ लिखने का मन हुआ तो मन में चंद पंक्तियाँ सूझी -
ये कैसे कैसे लोग देखो चोटी पर पहुँच गए
हमें बेचने निकले थे और खुद ही बिक गए...
शोरे पैहम मचाया है सहर में खूब ईमानदारी का
बेईमानों से चालबाजियां और देखो क्या क्या सीख गए..
वादा किया था महरूमों से आवाज़ उठाऊंगा उनकी
खबरों के ठेकेदार मगर दोस्तों रस्ते में मिल गए...
बहुत महंगें हैं दाल चावल भूखे हैं लोग यहाँ
इस बाज़ार में यूँ ही हम किसी को सस्ते में मिल गए...

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